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छात्र नेता

रविशंकर प्रसाद बचपन से ही पटना में स्थित कदम कुआं के कांग्रेस मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में भाग लेने जाते थे। यहाँ उन्हें श्री गोविंदाचार्य का लगातार मार्गदर्शन मिला। श्री नानाजी देशमुख, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, श्री अटल बिहारी वाजपेयी और श्री लाल कृष्ण आडवाणी जैसे महान नेताओं का उनके छात्र जीवन पर बहुत गहरा असर पड़ा।

वे 15 साल की उम्र में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हुए। 1972 में उन्हें पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के सहायक महासचिव के रूप में चुना गया। श्री लालू प्रसाद यादव इसके अध्यक्ष एवं श्री सुशील कुमार मोदी महासचिव थे।

भारत में कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाजें उठ रही थीं। 1972 के उत्तरार्ध में श्री गोविंदाचार्य के नेतृत्व वाली संचालन समिति का गठन किया गया। श्री नीतीश कुमार, श्री नरेन्द्र सिंह, श्री वशिष्ठ नारायण सिंह और श्री रवि शंकर प्रसाद इस समिति के सदस्य थे। समिति ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने संघर्ष को तेज करने का फैसला किया।

18 मार्च 1973 को श्री ठाकुर प्रसाद के नेतृत्व में छात्रों ने बिहार विधान सभा का घेराव किया। पुलिस ने आंदोलनकारी छात्रों पर लाठीचार्ज किया और अगले ही दिन श्री ठाकुर प्रसाद को गिरफ्तार कर लिए गया। श्री ठाकुर प्रसाद की गिरफ्तारी के बाद श्री सुशील मोदी, श्री लालू प्रसाद यादव, श्री नीतीश कुमार और श्री रवि शंकर प्रसाद जैसे युवा नेताओं ने आंदोलन को जारी रखा। श्री ठाकुर प्रसाद को सात दिनों के बाद जेल से रिहा कर दिया गया।

श्री जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन को आगे और प्रोत्साहन मिला एवं इसकी विश्वसनीयता बढ़ी। श्री ठाकुर प्रसाद ने विधानसभा भवन के बाहर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जो प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों में बड़ी सुर्खियों में रहा और इसे ऑल इंडिया रेडियो द्वारा देश भर में प्रसारित किया गया था।

जहाँ एक तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की इस लहर में तेजी आ रही थी, वहीं दूसरी तरफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 जून 1975 को सुनाये गए अपने फैसले में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर चुनावी कदाचार का सहारा लेने का आरोप लगाते हुए उनके चुनाव को रद्द घोषित कर दिया। न्यायालय के इस फैसले से उत्साहित होकर लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने दिल्ली के बोट क्लब में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए सुरक्षा बलों एवं भारत के लोगों से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को पद से हटाने का आह्वान किया। इस स्थिति से घबरा कर कांग्रेस पार्टी और प्रधानमंत्री ने 25 जून 1975 को देश में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी।

देश में आपातकाल का दमनकारी प्रभाव शीघ्र ही देखने को मिला जब अगले ही दिन सत्तारूढ़ सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध कर रहे सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। श्री जय प्रकाश नारायण, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण आडवाणी, श्री मधु लिमये, श्री चन्द्र शेखर, श्री कृष्ण कांत, श्री मोहन धरिया को गिरफ्तार कर नई दिल्ली के तिहाड़ जेल में सलाखों के पीछे डाल दिया गया। श्री नानाजी देशमुख, श्री गोविंदाचार्य, श्री सुशील मोदी और श्री रवि शंकर प्रसाद जैसे नेता गुप्त रूप से छिप गए। कुछ महीने बाद, अगस्त 1975 में श्री रवि शंकर प्रसाद को भी गिरफ्तार कर पटना के बांकीपुर सेंट्रल जेल में डाल दिया गया।

गिरफ्तारी के लगभग एक वर्ष बाद श्री ठाकुर प्रसाद, श्री रवि शंकर प्रसाद और श्री लालू प्रसाद यादव को जेल से छुडवाने में सफल हुए। पटना उच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित वकील श्री ठाकुर प्रसाद ने आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किये गए लगभग दो हजार छात्रों को जेल से रिहा करवाया।

श्री रविशंकर प्रसाद पर छात्र आंदोलन का इतना गहरा असर पड़ा कि वे शायद ही पढ़ाई के लिए समय निकाल पाते थे। यह देखकर उनके पिताजी के करीबी मित्र श्री कैलाश राय ने उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान न देने के लिए एक बार डांट लगाई एवं परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती दी थी। श्री रवि शंकर प्रसाद ने इस चुनौती को अनुग्रहपूर्वक स्वीकार करते हुए अपनी पढ़ाई तथा छात्र आंदोलन के बीच एक संतुलन बनाये रखने का निर्णय किया। जेल से रिहा होने के बाद पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय करने के बाद उन्हें धैर्य एवं शांतचित्त होकर कुछ घंटे बैठने और पढ़ाई पर ध्यान देने में कठिनाई होती थी। लेकिन परीक्षा में उत्कृष्ट परिणाम लाने की उनकी प्रतिबद्धता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों से कह रखा था कि उन्हें उनकी पढ़ाई के समय अध्ययन कुर्सी पर एक रस्सी से बांध दिया जाए। इस तरह से उन्होंने अपनी परीक्षा दी एवं उत्कृष्ठ परिणाम लाने में सफल रहे।

जब वे पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे थे, उन्हें विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित सीनेट समिति में चुना गया। विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी छात्र को इस समिति में चुना गया जिसमें पहले केवल शिक्षक ही होते थे। उन्होंने 1980 में पटना विश्वविद्यालय से एल.एल.बी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे वकील-संघ में शामिल हो गए एवं पटना उच्च न्यायालय में वकील के रूप में अपनी प्रैक्टिस शुरू की।

पटना उच्च न्यायालय में अपनी प्रैक्टिस शुरू करने के बाद उन्होंने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के माध्यम से नागरिक अधिकारों को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाते हुए कई नक्सली कार्यकर्ताओं को जेल से रिहा करवाया।